इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक कोच की छत पर 7 किलोवाट पीक क्षमता के सोलर पैनल लगाए गए हैं। सूरज की रोशनी से पैदा होने वाली बिजली को बैटरी बैंक में स्टोर किया जाता है, जिसका इस्तेमाल कोच की लाइट, पंखे और चार्जिंग पॉइंट जैसी यात्री सुविधाओं के लिए किया जा सकता है।
उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा के मुताबिक, रेलवे का उद्देश्य स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाना है। इसी दिशा में सोलर पैनल से लैस इस कोच को तैयार किया गया है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, इस पहल का पर्यावरण पर भी बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता पुलकित श्रीवास्तव ने बताया कि एक कोच में लगे सोलर सिस्टम से सालाना करीब 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होने का अनुमान है। अधिकारियों ने इसे करीब 500 पेड़ों से होने वाली कार्बन बचत के बराबर बताया है।
फिलहाल रेलवे इस परियोजना को पायलट आधार पर परख रहा है। अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन और सफलता का आकलन किया जाएगा।
अगर प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में इस तकनीक को दूसरी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों में भी बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। रेलवे को उम्मीद है कि इससे परिचालन लागत घटाने के साथ स्वच्छ और टिकाऊ रेलवे नेटवर्क के लक्ष्य को भी गति मिलेगी।
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