आज ही के दिन स्थापित हुई थी "ईस्ट इंडिया कंपनी"
(India) इसे पूर्व में जॉन कंपनी के नाम से भी जाना जाता था। इसे ब्रिटेन की महारानी ने भारत के साथ व्यापार करने के लिये 21 सालों तक की छूट दे दी थी। बाद में कम्पनी ने भारत के लगभग सभी क्षेत्रों पर अपना सैनिक तथा प्रशासनिक अधिपत्य जमा लिया । भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने के लिए इस कंपनी ने ही ब्रिटेन का सहयोग किया । 1498 ई. में वास्को-डी-गामा ने युरोप से भारत को जाने वाले सामुद्रिक मार्ग की खोज की । यह खोज एक युगान्तकारी घटना सिद्ध हुई । गामा की इस खोज ने भारत और यूरोप के पारस्परिक इतिहास के संबंध में एक नए अध्याय का सूत्रपात किया, इसके फलस्वरूप यूरोप के लोग भारतीय इतिहास के रंगमंच पर पहले व्यापारियों के रूप में और फिर बस्तियों के बनाने वालों के रूप में उतर आए। वास्को-डी-गाम ने कालीकट के हिन्दू शासक जमोरिन से पुर्तगालियों के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त की। इसके बाद पुर्तगालियों का भारत में व्यापार आरम्भ हुआ। सोलहवीं शताब्दी में उन्होंने दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर कालीकट, कोचीन और कलानौर के स्थानों पर अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए और गोआ, दमन एवं दीव आदि स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर लीं। इतना ही नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए वहाँ सुदृढ़ नौसेना भी रखी। पुर्तगालियों की बढ़ती हुई शक्ति तथा व्यापार से प्रभावित होकर अन्य यूरोपियन देशों ने भी भारत के साथ व्यापार करने के लिए अपनी व्यापारिक कंपनियां स्थापित की। 1602 ई. में हालैण्ड के डच व्यापारियों ने भारत में व्यापार के लिए एक कंपनी स्थापित की। अब भारतीय व्यापार के लिए पुर्तगालियों एवं डचों में संघर्ष आरंम्भ हो गया, जिसमें डचों को सफलता प्राप्त हुई। इस समय इंग्लैण्ड में व्यापारियों ने भी पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करने का निश्चय किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के 24 सितम्बर, 1599 ई. को लन्दन के कुछ प्रमुख व्यापारियों ने फाउण्डर्स हॉल में एक सभा की, जिसकी अध्यक्षता नगरपालिका के अध्यक्ष लार्ड मेयर ने की। गंभीर सोच-विचार के बाद इन व्यापारियों ने व्यापार सम्बन्धी अधिकार प्राप्त करने के लिए महारानी एलिजाबैथ की सेवा में एक प्रार्थना पत्र भेजा। महारानी ने इस प्रार्थना पत्र पर 31 दिसम्बर, 1600 ई. को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस प्रकार भारत के साथ व्यापार करने के लिए ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना हुई, जिसका नाम गर्वनर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स इन्टू द ईस्ट इण्डीज (पूर्वी इण्डीज में व्यापार करने वाले व्यापारियों की कंपनी और प्रशासक) रखा गया।

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