प्रख्यात शायर पद्ममश्री बेकल उत्साही का आज नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें ब्रेन हैमरेज के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शेरो शायरी में गंगा जमुनी तहजीब का जैसे सूर्य अस्त हो गया। एक नए परम्परा के जन्मदाता पद्मश्री बेकल उत्साही ने उर्दू व हिन्दी भाषा को पूरा सम्मान दिया। स्थानीय भाषा के मिश्रण से उन्होंने गजल व शेरो शायरी में कई प्रयोग किए जो श्रोताओं के सिर चढ़कर बोला। पद्मश्री बेकल उत्साही का जन्म एक जून 1928 को ग्राम रमवापुर, उतरौला में जमींदार पिता लोदी मोहम्मद शफी खान के यहां हुआ था। माता का नाम बिस्मिल्लाह बीबी था। बेकल का असली नाम शफी खान है और गांव के लोग प्यास से इन्हें भुल्लन भैया कहकर पुकारते थे। सदा भीड़-भाड़ में रहने वाले बेकल उत्साही को अकेलापन पसंद था। गुलामी के दौर में बेकल अंग्रेज हुक्मरानों के खिलाफ जवानी में राजनीतिक नज्म व गीत लिखने लगे। अंग्रेजों को यह हरकत नागवार गुजरी और बेकल को कई बार जेल जाना पड़ा। जेल से ही उन्होंने नातिया शायरी की शुरुआत की। बेकल ने साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता के लिए हिन्दी और उर्दू भाषा को आपस में मिलाकर एक नई शैली प्रदान की। जिसे बेकल शैली कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। बेकल उत्साही पूरी तरह से अदबी माहौल में रहने लगे और मुशायरा, नातिया व मजहबी जलसों तथा कवि सम्मेलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। गजल में क्षेत्रीय भाषा का अक्स मिलाकर उसे नई राह दी। कोई भी देश अछूता नहीं था जहां उनकी शायरी का लोहा न माना गया हो। उन्होंने इंग्लैंड, अफ्रीका, पाकिस्तान व अमेरिका जैसे देशों का दौरा कई बार किया।
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