गणित विज्ञान का आधार रही है। विश्व में यदि शून्य नहीं होता, तो शून्य अर्थात अंतरिक्ष को खंगालने का क्रम शायद आरंभिक रूप भी नहीं ले पाता। भारत की इस देन को विश्व सदियों से स्वीकार करता चला आया है। गणित के क्षेत्र में हमारी पुरातन संस्कृति का योगदान रहा है। विश्व में शून्य का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में प्राप्त होता है। यजुर्वेद में इसके लिए क्षुद्र शब्द का प्रयोग किया गया है। वेदों में धनात्मक को रिक व ऋणात्मक को अरिक शब्द से प्रदर्शित किया गया है। सिंधु सभ्यता के वासियों ने ज्यामितीय के साधारण यंत्रों जैसे- प्रकार एवं पटरी आदि का भी विकास कर लिया था। मोहनजोदड़ो की सीपी से बनी दशांश मापनी, लोथल की हाथीदांत से बनी मापनी, हड़प्पा व कालीबंगा से मापनी छड़ें प्राप्त हुई हैं। वैदिक विद्वान मेधातिथि ने दशमलव पद्धति के आधार पर बड़ी-बड़ी संख्याओं को विकसित करते हुए रार्ध (दस की बारहवीं घात) तक की संख्याएं निरूपित कीं। ईसा की प्रथम शताब्दी तक भारतीय तल्लक्षण (दस की तिरपनवीं घात) तक की संख्याओं को व्यक्त करने में सक्षम हो गए थे।
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