मुस्लिमों में शिक्षा की अलख जगाई थी मौलाना आजाद ने
(India) महात्मा गांधी ने जहां "हरिजन" और "नवजीवन" के माध्यम से फिरंगी सरकार के अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की। वहीं, मौलाना अबुल कलाम आजाद ने "अल हिलाल" और "अलबलाग" के माध्यम से भारतीयों के दिल में स्वतंत्रता के प्रति एक नई अलख जगाई। मौलाना आजाद की पत्रकारिता उनके राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के प्रति उनके दृढ़ विश्वास की प्रतीक थी। 11 नवंबर 1888 को सऊदी अरब के एक विद्वान परिवार में जन्मे मौलाना ने मात्र 11 वर्ष की आयु में "नैरंगे आलम" का प्रकाशन शुरू किया। जिसमें उस समय के कवियों की रचनाएं शामिल होती थीं। 1904 में मौलाना ने "अल मिस्बाह" नामक एक साप्ताहिक पत्र शुरू किया और साथ ही "मखजन" और "अहसनुल-अखबार" में उनके निबंध छपने लगे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इंडिया विन फ्रीडम में लिखा है कि 1908 में वे मिस्त्र, इराक और तुर्की के आध्यात्मिक दौरे पर रवाना हुए। मिस्त्र में उनका संपर्क मुस्तफा कमाल पाशा के समर्थकों से हुआ। जो वहां से एक साप्ताहिक निकाल रहे थे। मौलाना ने तुर्की में तुर्क नवयुवकों के आंदोलन के नेताओं से मुलाकात की। मौलाना के संबंध इन नेताओं से इतने गहरे हुए कि भारत वापसी के कई वर्ष बाद भी दोनों के दरम्यान खतों का सिलसिला जारी रहा। इराक में मौलाना ने ईरानी क्रांतिकारियों से मुलाकात की। इन मुलाकातों ने मौलाना के इस विश्वास को पुख्ता किया कि भारतीय मुसलमानों को अंग्रेज सरकार के विरूद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़कर भाग लेना चाहिए। कुछ समय सोच विचार के बाद 1912 में मौलाना ने अलहिलाल जारी किया। ताकि उसके माध्यम से मुसलमानों में क्रांति की विचारधारा प्रचलित हो। मौलाना की पत्रकारिता इतनी लोकप्रिय थी कि तीन महीनों के अंदर ही अलहिलाल के सभी पिछले संस्करणों का पुर्नप्रकाशन करना पड़ा। क्योंकि इस समाचार पत्र का हर नया खरीददार, हर संस्करण को रखने का इच्छुक था। अलहिलाल की लोकप्रियता अंग्रेज सरकार को बुरी लगी। उसने प्रेस एक्ट के तहत दो हजार रूपए की जमानत मांगी। मौलाना ने जमानत तो दे दी पर अपने समाचारपत्र की सरकार - विरोधी भाषा नहीं बदली। इस पर सरकार ने दस हजार रूपए की ताजा जमानत मांगी। मौलाना ने फिर जमानत तो दे दी पर अपनी क्रांतिकारी भाषा को नहीं दबने दिया। अंतत: 1915 में अलहिलाल प्रेस जब्त कर लिया गया। मौलाना आजाद का जन - जागरण का दृढ़ संकल्प इस कार्यवाही के बावजूद अटल रहा और उन्होंने पांच महीने के अन्दर "अल-बलाग" नाम से एक और समाचारपत्र जारी किया फिरंगी सरकार पिछले अनुभवों की रोशनी में समझ गई कि मौलाना पर प्रेस एक्ट के प्रावधानों का कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। इसलिये उसने डिफेन्स ऑफ इण्डिया के तहत अप्रैल 1916 में मौलाना को कलकत्ते से बाहर जाने को कहा। पंजाब, यूपी, दिल्ली और मुम्बई की सरकारों ने इसी कानून के तहत मौलाना के प्रवेश पर रोक लगा दी। अब बिहार ही एक सूबा था जहां मौलाना आजाद जा सकते थे। परन्तु जब मौलाना रांची पहुंचे ही थे कि उन्हें नजरबंद कर दिया गया। नजरबंदी का सिलसिला 31 दिसम्बर 1919 तक रहा। पहली जनवरी 1920 को मौलाना रिहा कर दिये गये। 1921 में मौलाना आजाद ने "पैगाम" नाम का एक साप्ताहिक शुरू किया जिस पर अंग्रेज सरकार ने उसी साल प्रतिबंध लगा दिया और मौलाना को कुछ समय के लिए हिरासत में ले लिया। 1927 में मौलाना आजाद ने दोबारा अल-हिलाल का प्रकाशन शुरू किया। ये सिलसिला उस वर्ष की समाप्ति तक जारी रहा। एक पत्रकार और समाज सुधारक के रूप में मौलाना आजाद ने कई सफलताएं प्राप्त की। उन्होंने उर्दू पत्रकारिता को पहली बार अच्छी लिथोग्राफिक छपाई और हाफटोन चित्रों से परिचित किया। उन्होंने अपने समाचारपत्रों से पूरे देश की जनता को विशेष रूप से मुसलमानों को स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रति जागृत किया जिसके कारण उन्हें जेल की मुसीबतें झेलनी पड़ीं थीं। स्वतन्त्र भारत में वे पहले शिक्षा मंत्री बने। शिक्षामंत्री के रूप में मौलाना आजाद ने कई काम किए। वैज्ञानिक शिक्षा को प्रोत्साहन, कई विश्वविद्यालयों की स्थापना, उच्च शिक्षा और खोज को प्रोत्साहन मौलाना के कार्यकाल में ही व्यापक स्तर पर शुरू हुए। उन्होंने देश के मुस्लिम समाज के लिए कार्य करते हुए 22 फरवरी 1958 को नई दिल्ली में अपनी अंतिम सांस ली।

DISCLAIMER: इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।