इसके बैनर तले उन्होंने वर्ष 1943 में फिल्म "शकुंतला" का निर्माण किया। फिल्म ने एक सिनेमा घर में लगातार 104 हफ्ते चलकर टिकट खिड़की पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्म "डा.कोटनीस की अमर कहानी" शांताराम निर्देशित महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है जिसमें मुख्य किरदार की भूमिका उन्होंने स्वयं निभाई थी। वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" शांताराम निर्देशित पहली रंगीन फिल्म थी। इसके लिए शांताराम को पहली बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म "दो आंखे बारह हाथ" शांताराम की सर्वाधिक सुपरहिट फिल्म साबित हुई। इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वहीं फिल्म बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बीयर अवार्ड और सैमुयल गोल्डन अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। सत्तर के दशक में शांताराम ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया। वर्ष 1986 में प्रदर्शित फिल्म "झांझर" शांताराम निर्देशित अंतिम फिल्म थी। फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गई जिससे शांताराम को गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया। वर्ष 1985 में फिल्म निर्माण में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वह फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इसके अलावा वर्ष 1992 में उन्हें पद्मविभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। शांताराम ने अपने छह दशक लंबे सिने करियर में लगभग 50 फिल्मों को निर्देशित किया। शांताराम 30 अक्टूबर 1990 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।
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