सिनेमा जगत के पितामह थे वी शांताराम
(India) शांताराम का पूरा नाम राजाराम वानकुदरे था। शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। उनका रूझान बचपन से ही फिल्मों की ओर था। हालांकि करियर के शुरूआती दौर में गंधर्व नाटक मंडली में उन्होंने पर्दा उठाने का भी काम किया। शांताराम ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1921 में प्रदर्शित मूक फिल्म "सुरेख हरण" से की। इस फिल्म में उन्हें बतौर अभिनेता काम करने का अवसर मिला। इस बीच शांताराम की मुलाकात भी.जी दामले, एस कुलकर्णी, एस फतेलाल और के.आर धाइबर से हुई जिनकी सहायता से उन्होंने वर्ष 1929 में प्रभात कंपनी फिल्म्स की स्थापना की। प्रभात कंपनी के बैनर तले शांतराम ने "खूनी खंजर", "रानी साहिबा" और "उदयकाल" जैसी फिल्में बनाई। वर्ष 1932 में आई फिल्म "अयोध्यचे राजा" शांताराम के सिने करियर की पहली बोलती फिल्म थी। वर्ष 1937 में शांताराम निर्देशित फिल्म "संत तुकाराम" टिकट खिड़की पर सुपरहिट होने के साथ-साथ पहली भारतीय फिल्म थी जिसे मशहूर वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित किया गया। वर्ष 1936 में ही शांताराम की फिल्म "अमर ज्योति" सुपरहिट हुई। वर्ष 1942 में शांतराम ने प्रभात कंपनी को अलविदा कह दिया और मुंबई में राजकमल फिल्म्स और स्टूडियो की स्थापना की।
इसके बैनर तले उन्होंने वर्ष 1943 में फिल्म "शकुंतला" का निर्माण किया। फिल्म ने एक सिनेमा घर में लगातार 104 हफ्ते चलकर टिकट खिड़की पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्म "डा.कोटनीस की अमर कहानी" शांताराम निर्देशित महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है जिसमें मुख्य किरदार की भूमिका उन्होंने स्वयं निभाई थी। वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" शांताराम निर्देशित पहली रंगीन फिल्म थी। इसके लिए शांताराम को पहली बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म "दो आंखे बारह हाथ" शांताराम की सर्वाधिक सुपरहिट फिल्म साबित हुई। इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वहीं फिल्म बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बीयर अवार्ड और सैमुयल गोल्डन अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। सत्तर के दशक में शांताराम ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया। वर्ष 1986 में प्रदर्शित फिल्म "झांझर" शांताराम निर्देशित अंतिम फिल्म थी। फिल्म टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गई जिससे शांताराम को गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया। वर्ष 1985 में फिल्म निर्माण में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वह फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इसके अलावा वर्ष 1992 में उन्हें पद्मविभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। शांताराम ने अपने छह दशक लंबे सिने करियर में लगभग 50 फिल्मों को निर्देशित किया। शांताराम 30 अक्टूबर 1990 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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