कौन हैं जॉन लैंग
जॉन लैंग का जन्म साल 1816 में सिडनी में हुआ था। उनके बारे में कहा जाता है कि वे ऑस्ट्रेलिया में जन्मे पहले उपन्यासकार थे। वे न केवल वकील थे बल्कि उन्हें पत्रकार और साहित्यकार के रूप में भी जाना जाता है। वे बड़े ही घुमंतू प्रवृत्ति के थे। उन्हें देश-दुनिया की सैर करना पसंद था। साल 1842 में समुद्री रास्ते भारत पहुंचे और यहां अपना नया घर बना लिया। अपने भारत पहुंचने के तीन साल बाद ही 1845 में उन्होंने यूपी के मेरठ से एक अखबार ‘द मुफस्सीलाइट’ का प्रकाशन शुरू किया। कुछ सालों बाद उन्होंने इसका प्रकाशन मसूरी से करना शुरू कर दिया।
ब्रिटिश हुकूमत ने भेज दिया जेल
उनका यह अखबार ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया की हानिकारक नीतियों की आलोचना करने के लिए जाना जाता था। इसका नतीजा यह हुआ कि उनसे नाराज ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके ऊपर मुकदमा कर दिया। मुकदमे के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। जेल जाने के बाद भी जॉन लैंग की आलोचनात्मक प्रवृति नहीं रुकी। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपना पूरा समय वकालत के पेशे और लेखन को देना शुरू कर दिया। इसी के चलते साल 1854 में उनकी भेंट झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से हुई। रानी ने उन्हें अपने उत्तराधिकारी के मुकदमे के लिए अपना वकील नियुक्त किया था। ऑस्ट्रेलिया में मोदी द्वारा भेंट किए गए दस्तावेज।
झांसी की रानी के उत्तराधिकार की लड़ाई लड़ी
जॉन लैंग से भेंट के पहले झांसी की रानी के परिवार के खजाने पर नजर लगाए अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को उनका उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया था। अंग्रेज चाहते थे कि वे झांसी के राज्य को ब्रिटिश साम्रज्य में मिला लें ताकि राजपरिवार के अकूत खजाने पर उनका कब्जा हो जाए। अंग्रेजों की इस चाल को समझते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने जॉन लैंग से सलाह ली। जॉन लैंग ने रानी की मदद के लिए लंदन कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया। पीएम मोदी ने इसी मुकदमे की याचिका का मूलपत्र ऑस्ट्रेलिया के पीएम टोनी एबॉट को भेंट स्वरुप दिया। जॉन लैंग ने इस मुकदमे में काफी बहस की लेकिन ब्रिटिश जज ने मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने झांसी राज्य का खजाना अपने कब्जे में ले लिया और उनके पति गंगाधर राव निम्बालकर के कर्ज की वसूली रानी को मिलने वाले सालाना खर्च से करने फरमान जारी कर दिया।
चार्ल्स डिकेन्स के लिए भी किया काम
जॉन लैंग ने मशहूर साहित्यकार की पत्रिका हाउसहोल्ड वर्ड्स के लिए बतौर भारतीय संवाददाता भी काम किया था। साल 1859 में इस पत्रिका ने जॉन लैंग के भारत भ्रमण के संस्मरणों को श्वैंडरिंग्स इन इंडियाश् के नाम से प्रकाशित किया। इन संस्मरणों में जॉन लैंग ने मसूरी और उसके आसपास के इलाकों का बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया था। लैंग ने कई उपन्यास भी लिखे, इनमें बॉटनी बे, टू क्लियर बाय हाफ और टू मच अलाइक प्रमुख हैं। साल 1864 में जॉन लैंग की मौत वर्ष 48 वर्ष की उम्र में मसूरी में ही हुई। उन्हें मसूरी के कैमल बेक रोड स्थित सिमिट्री में दफनाया गया था
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