- सरकार को केाई भी फैसला लागू करने से पहले एलजी की 'राय' लेनी होगी, इनमें वह फैसले भी
शामिल हैं जो मंत्रिमंडल करेगा।
- एलजी उन मामलों को तय कर सकेंगे जिनमें उनकी 'राय' मांगी जानी चाहिए।
- विधानसभा के बनाए किसी भी कानून में 'सरकार' का मतलब एलजी होगा।
- विधानसभा या उसकी कोई समिति प्रशासनिक फैसलों की जांच नहीं कर सकती और उल्लंघन में
बने सभी नियम रद्द हो जाएंगे।
- पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और लैंड को छोड़कर राज्य सूची में जो भी विषय हैं, उसमें राज्य सरकार
कानून बना सकती है।
- जो भी फैसला सरकार लेगी उसके बारे में वह एलजी को अवगत कराएगी, लेकिन एलजी की
सहमति जरूरी नहीं है।
- अपवाद के तहत एलजी किसी मामले को राष्ट्रपति को रेफर कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ हर
मामला नहीं है। यह सरकार के लिए राहत की बात है।
डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया ने कहा कि "दिल्ली की जनता द्वारा विधानसभा और एमसीडी उपचुनाव में खारिज किये जाने के बाद केंद्र में बैठी भाजपा सरकार ने दिल्ली की जनता द्वारा चुनी गई दिल्ली सरकार के अधिकारों को छीन कर उपराज्यपाल को देने के बिल को लाने की तैयारी कर ली है। केंद्र सरकार द्वारा लाया गया यह बिल लोकतंत्र और संविधान की आत्मा के खिलाफ होगा। इस बिल के माध्यम से बीजेपी उपराज्यपाल के साथ पिछले दरवाजे से दिल्ली की जनता पर शासन करने की तैयारी में है। भाजपा की केंद्र सरकार एलजी की शक्तियां बढ़ाकर दिल्ली के विकास को रोकने की तैयारी में है।"
दूसरी तरफ, बिल का स्वागत करते हुए दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। उन्होंने कहा कि इस बिल से दिल्ली में गवर्नेंस बेहतर होगी और प्रशासन से जुड़े अहम मामलों में राज्य सरकार और उपराज्यपाल की संवैधानिक भूमिकाएं स्पष्ट होंगी। दिल्ली बीजेपी के चीफ आदेश गुप्ता ने कहा कि इस बिल से आखिरकार केंद्र और दिल्ली की सरकारों के बीच के प्रशासनिक कार्यों और शक्तियों का विवाद खत्म हो जाएगा।
कांग्रेस ने कहा कि इस बिल से दिल्ली के लोगों की शक्तियां छीन ली जाएंगी। पार्टी ने इसे 'काला बिल' बताते हुए बुधवार को इसके खिलाफ जंतर मंतर पर धरना देने का भी ऐलान किया। पूर्व विधायक अनिल भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली सरकार के पास पहले से ही जमीन और पुलिस को लेकर कोई ताकत नहीं है, यह बिल उसे और कमजोर करेगा।
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