कभी वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका का सबसे समृद्ध देश था। 1950 से 1980 के बीच इसकी प्रति व्यक्ति आय चीन और जापान से कई गुना अधिक थी। तेल से आने वाली कमाई ने इसे ‘सऊदी वेनेजुएला’ की पहचान दिलाई। लेकिन तेल पर अत्यधिक निर्भरता, कुप्रबंधन और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था की जड़ें खोखली कर दीं। ह्यूगो शावेज के दौर में तेल की ऊंची कीमतों से सामाजिक योजनाओं को बल मिला, लेकिन उत्पादन क्षमता और अन्य क्षेत्रों में निवेश नहीं हुआ। 2014 में तेल कीमतें गिरते ही पूरा मॉडल ढह गया।
निकोलस मादुरो के कार्यकाल में हालात और बिगड़े। अमेरिकी प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और बेतहाशा नोट छापने से देश महंगाई के दलदल में फंस गया। 2018 में मुद्रास्फीति लाख प्रतिशत के पार पहुंची और करोड़ों लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए। भुखमरी, बेरोजगारी और पलायन ने वेनेजुएला की सामाजिक संरचना तोड़ दी। अब सवाल यह है कि मादुरो के बाद क्या हालात बदलेंगे या तेल, कर्ज और विदेशी प्रभावों की जटिलता वेनेजुएला की राह को और मुश्किल बनाएगी।
Author: JAN TV Editorial Team
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