क्यों हमें खुद के भीतर परमात्मा का दर्शन नहीं हो पाता..
(India) प्रेम उपासना है, साधना है भक्ति के शिखर पर ज्ञान है और ज्ञान के शिखर पर प्रेम है। मनुष्य को अपना श्रम ज्ञान दीप को प्रज्वलित करने में लगाना चाहिए। इससे वासना की जगह उपासना जागृत होती है। परमात्मा द्वारा निर्मित मंदिर में जहां उनका वास होता है, उनका दर्शन अहंकार रोकता है क्योंकि अहंकार कभी-कभी स्वयं ईश्वर होने का दंभ भरता है। मानव का पूरा शरीर मंदिर स्वरूप है। मनुष्य का हृदय गर्भ गृह है। सिर शिखर और शिखा ध्वजा है जबकि मस्तिष्क मंदिर है जिसमें ठाकुर जी स्वयं विराजते हैं। चित में प्रज्ञा का प्रकाश, ज्ञान का दीपक जले तभी ठाकुर जी का निराकार स्वरूप दिखलाई देता है। भागवत श्रवण से चित रूपी दीपक जलाने का प्रयास मानव को करना चाहिए। मानव को अज्ञानता से लड़ना चाहिए मगर आलोचना और अज्ञानता पर चर्चा करके अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। मानव उत्साह की रंगोली सजाकर उमंग के रंगभरे, निराशा से बचे। साधारण जीव को प्रभा का प्रकाश शीतलता को समाहित करना चाहिए, भय मृत्यु का शंखनाद है जबकि निर्भयता नारायण का प्रसाद है। निर्भयता प्रभु को स्वयं को समर्पित करने से आती है।

Author: JAN TV Editorial Team

DISCLAIMER: इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।