मां दुर्गा के सातवें स्वरूप को कालरात्रि कहा जाता है, दुर्गा-पूजा के सातवें दिन मां काल रात्रि की उपासना का विधान है। सप्तमी की पूजा सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है... इनका वर्ण अंधकार की भांति काला है, केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है... मां कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह विशाल और गोल हैं... जिनमें से बिजली की भांति किरणें निकलती रहती हैं.. मां का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए है। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। इस देवी के तीन नेत्र हैं। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। वहीं सीधे हाथ की तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, और निर्भय रहो। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
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