(India)
हम मनुष्य हैं इसलिये कि हमारे पास मनन करने के लिए बुद्धि है। बुद्धि से हम अध्ययन कर सकते हैं और सत्य व असत्य का निर्णय करने में सक्षम हो सकते हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि की उन्नति किस प्रकार करते हैं, यह प्रायः हम सभी जानते हैं। मनुष्य का जीवन माता के गर्भ से जन्म के साथ आरम्भ होता है। हम एक जीवात्मा हैं। हमें परमात्मा ने ज्ञान प्राप्ति, पुरुषार्थ एवं साधना आदि करने के लिए यह शरीर दिया है। जन्म से पूर्व हमारा क्या व कैसा अस्तित्व था यह हम भूले हुए हैं। जिस प्रकार हमें दिन भर के अपने समस्त व्यवहार स्मरण नहीं रहते उसी प्रकार पूर्व जन्म की बातें कि हम पूर्व जन्म में क्या थे, कहां थे, इसका हमें कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। ऐसा होना सम्भव कोटि में आता है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमारा पूर्व जन्म नहीं था और कि यह हमारा प्रथम व सर्वथा नया जन्म है। शास्त्रों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि हमारी आत्मा सत्य, चित्त, ज्ञान व कर्म करने में समर्थ, जन्म व मरण के बन्धन से आबद्ध और वेद ज्ञान व साधना से मोक्ष प्राप्ति में समर्थ, अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर, एकदेशी व ससीम है। आत्मा का यह स्वरूप विचार करने पर सत्य सिद्ध होता है। हमें अपनी आत्मा के स्वरूप का अध्ययन व मनन करते रहना चाहिये जिससे हम कर्तव्य से विमुख न हो सकें। इसके साथ ही हमें वेदाध्ययन करते हुए इतर वैदिक आर्ष साहित्य का भी अध्ययन करना चाहिये जिससे हमें ईश्वर के स्वरूप व उसके प्रति ईश्वरोपासना, यज्ञ कर्मों का भी स्मरण रहे व हम इन्हें सामर्थ्यानुसार करते रहें।
Author: JAN TV Editorial Team
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