माह-ए-रमजान में अल्लाह तआला बंदों पर रहमतों की बारिश करते हैं। इसी बारिश की एक कड़ी एतकाफ भी है, जो हमें अल्लाह के करीब ले जाती है। एतकाफ बंदे और अल्लाह के बीच का फासला कम करता है। माह-ए-रमजान को इबादतों का गुलदस्ता कहते हैं। एक ही माह के अंदर रोजा, नमाज, तिलावत, जकात, तरावीह, एतकाफ के साथ तमाम इबादतों को बंदा अमल में लाता है। ऐसी ही एक इबादत का नाम एतकाफ है जो रमजान के आखिरी अशरे में हासिल होती है।
रमजान के आखिरी अशरे में दस दिन का एतकाफ होता है। एतकाफ का मतलब शब-ए-कद्र की तलाश में तन्हाई में बैठकर इबादत करना है। एतकाफ का समय 20वें रोजे को सूरज डूबने से पहले शुरू होता है और ईद का चांद दिखाई देने के बाद खत्म होता है। एतकाफ ऐसी जगह होती है जहां पांचों वक्त की नमाज जमात के साथ होती है। एतकाफ में बैठना सुन्नत है। इससे अल्लाह पूरी बस्ती के गुनाहों को माफ फरमा देते हैं। एतकाफ में बैठने वाला तमाम बुराइयों, गलतियों, गुनाहों से बच जाता है। उसकी इबादतों में रंगत आ जाती है।
Author: JAN TV Editorial Team
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