जब हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया, तो उन्होंने सूर्य से ज्योतिष, वेद, आयुर्वेद, नक्षत्र विज्ञान और अनेक दिव्य विद्याएं प्राप्त कीं। शिक्षा पूरी होने के बाद सूर्य देव ने हनुमान जी से गुरु दक्षिणा माँगी। उन्होंने कहा कि बिना विवाह के ब्रह्मज्ञान की पूर्णता संभव नहीं, क्योंकि कुछ शास्त्रों की शिक्षा ऐसी है जो केवल गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने पर ही प्राप्त की जा सकती है।
गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए हनुमान जी ने विवाह स्वीकार किया — लेकिन यह विवाह सांसारिक मोह या कामना के कारण नहीं था, बल्कि केवल एक आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में। सूर्य देव ने अपनी ही तेजस्वी पुत्री सुवर्चला देवी का प्रस्ताव रखा। सुवर्चला देवी स्वयं तपस्विनी और ज्ञान की देवी मानी जाती हैं। वह सूर्य देव की कृपा से तेजस्विता, साधना और दिव्य गुणों से युक्त थीं।
हनुमान जी और सुवर्चला देवी का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ, लेकिन हनुमान जी ने अपने ब्रह्मचर्य और संयम का पालन कभी नहीं छोड़ा। यह विवाह केवल ज्ञान की पूर्णता और धर्म की मर्यादा के लिए किया गया था। विवाह के बाद सुवर्चला देवी भी साधना में लीन हो गईं, और हनुमान जी श्रीराम की सेवा में लौट आए।
दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में आज भी हनुमान जी की मूर्ति उनके पत्नी स्वरूपा सुवर्चला देवी के साथ विराजमान है, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश के कुंचनपल्ली और अन्य कुछ मंदिरों में। इन मंदिरों में भक्त हनुमान जी को केवल एक योद्धा या भक्त के रूप में नहीं, बल्कि सनातन ज्ञान और गुरु-आज्ञा पालन की प्रतीक शक्ति के रूप में पूजते हैं।
हनुमान जी का यह अनोखा विवाह हमें यह सिखाता है कि धर्म में हर कार्य का एक उद्देश्य होता है — और वह उद्देश्य आत्मविकास, ज्ञान की प्राप्ति और सेवा भाव होता है, न कि केवल सांसारिक सुख। यह कथा इस बात की मिसाल है कि हनुमान जी न केवल बल और भक्ति के देवता हैं, बल्कि वे सनातन ज्ञान की जीवंत प्रतिमा भी हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
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