भगवान परशुराम का आदर्श जीवन बना युगों-युगों तक प्रेरणा का स्रोत, जानें उनके जीवन से जुड़ी विशेष बातें
(India) भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्मोत्सव हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह शुभ दिन 29 अप्रैल को पड़ रहा है। पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि 29 अप्रैल को शाम 5:31 बजे शुरू होकर 30 अप्रैल को दोपहर 2:12 बजे तक रहेगी। परंपरागत मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए जयंती 29 अप्रैल को मनाई जाएगी। इसी दिन अक्षय तृतीया भी आरंभ होती है, जिसे अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। भगवान परशुराम ने समाज को एकता, समरसता और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। वे भारतीय पुराणों में सबसे दीर्घजीवी पात्रों में से एक माने जाते हैं, जिनका उल्लेख सतयुग से लेकर कलियुग तक मिलता है। वे अन्याय के विरुद्ध खड़े रहने और सत्पुरुषों की रक्षा करने वाले योद्धा थे। उनका अवतरण त्रेता और सतयुग के संधिकाल में हुआ था, और उनका जीवन शौर्य, तपस्या और नीति का प्रतीक रहा। भगवान परशुराम ने समाज को संगठित करने और जीवन को व्यवस्थित करने का कार्य किया। उन्होंने दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में जाकर वहां के निर्बल वर्ग को संगठित किया और समुद्र से भूमि प्राप्त कर उसे बसाया। ऐसा भी वर्णन है कि उन्होंने अगस्त्य ऋषि से समुद्र हटाने की विद्या सीखी और ब्रह्मकुंड से जलधारा को नीचे लाकर ब्रह्मपुत्र नदी का निर्माण किया। यह उनके सामाजिक और भौगोलिक योगदान का उदाहरण है।
धर्म की रक्षा के लिए उठाया शस्त्र
परशुराम को क्षत्रियों के शत्रु के रूप में देखा जाता है, परन्तु उन्होंने केवल उन क्षत्रिय राजाओं के विरुद्ध युद्ध किया जो अन्याय और अहंकार में डूबे हुए थे। अपने पिता जमदग्नि की हत्या से व्यथित होकर उन्होंने अत्याचार के विरुद्ध शस्त्र उठाया। उनका उद्देश्य समाज में धर्म की स्थापना और न्याय की पुनः स्थापना करना था।
भृगु वंश की गौरवगाथा
भगवान परशुराम भृगु वंश से थे। इस वंश में अग्नि के आविष्कारक भृगु ऋषि, शुक्राचार्य, जमदग्नि, च्यवन और महर्षि मार्कण्डेय जैसे महान ऋषि हुए। इसी वंश में लक्ष्मी माता का जन्म भी हुआ माना जाता है। परशुराम ने इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया और ब्राह्मणों में भी न्यायप्रियता और संस्कारों के आधार पर योग्यता की कसौटी रखी।
भगवान परशुराम को चिरंजीवी माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि वे महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या में लीन हैं और कलियुग के अंत में पुनः प्रकट होकर धर्म की स्थापना करेंगे। श्रीराम के काल में उन्होंने राम को परशु-ज्ञान दिया और श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र भी प्रदान किया।

Author: JAN TV Editorial Team

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