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नई दिल्ली : प्रसिद्ध लेखक पं. विजय शंकर मेहता ने प्रशंसा और मूल्याकन को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति हमारी प्रशंसा करता है, तो उसे सुन कर अच्छा लगता है। लेकिन हर प्रशंसा सुन कर सच मान लेना उचित नहीं है। प्रशंसा को स्वीकार करने से पहले व्यक्ति को अपने काम और व्यवहार को खुद भी मूल्यांकन करना चाहिए।
विजय शंकर मेहता के अनुसार, व्यक्ति को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उसकी तारीफ किस आधार पर की जा रही है। यही प्रशंसा उसके वास्तविक काम मेहनत और व्यवहार पर आधारित है, तो वह आगे बेहतर करने की प्रेरणा बन जाती है। लेकिन व्यक्ति हर तारीफ को अंतिम सत्य मानने लगे तो इससे उसके भीतर अहंकार पैदा हो सकता है और वह अपने कमियों की नजरअंदाज करने लग सकता है।
प्रशंसा सुन कर खुद को परखना जरूर। किसी की तारीफ मिलना आत्मविश्वास बढ़ाने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह देखना भी जरुरी होता है जिस गुण की प्रशंसा की जा रही है, क्या वह गुण वास्तव में हमारे अंदर मौजूद है | व्यक्ति को कभी-कभी खुद से सवाल करना चाहिए कि उसने जो काम किया है। उसकी वास्तविक भूमिका क्या रही और क्या उसमे अभी सुधरने का समय है?
आत्म-मूल्यांकन का मतलन खुद को कम आंकना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि अपनी खूबियों के साथ-साथ अपनी कमियों को भी पहचान है इससे व्यक्ति अपनी काम को सुधर सकता है और भविष्य में बेहतर निर्णय ले सके।
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