अस्पतालों में मेडिकल सामान पर 400 से 1300% तक मार्जिन का आरोप, मरीजों पर बढ़ रहा इलाज का खर्च
(India) अस्पतालों में इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट (बीटी सेट), सिरिंज, कैथेटर और ग्लव्स जैसे जरूरी मेडिकल सामान की कीमतों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि इन सामानों की खरीद दर और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच करीब 400 से 1300 फीसदी तक का अंतर है। इससे मरीजों और उनके परिजनों पर इलाज का आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।

बार-बार इस्तेमाल होने वाले सामान का खर्च भी बिल में शामिल

इलाज के दौरान ग्लव्स, सिरिंज और कैथेटर जैसी वस्तुओं की जरूरत कई बार पड़ सकती है। कुछ मामलों में इनका इस्तेमाल दिन में दो से तीन बार तक किया जाता है। ऐसे में हर बार इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमत मरीज के कुल बिल में जुड़ जाती है। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने वाले मरीजों के लिए यह खर्च और अधिक बढ़ सकता है।

बाहर से दवा लाने पर अस्पतालों की अलग नीति

कई बड़े अस्पताल भर्ती मरीजों को दवाएं अपने अस्पताल के माध्यम से ही उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में बाहर के डॉक्टर की पर्ची या किसी अन्य स्रोत से लिखी गई दवा को देने से इनकार किया जा सकता है। अस्पताल प्रबंधन का तर्क है कि बाहर से लाई गई दवा की गुणवत्ता, उसके नकली होने या भंडारण में गड़बड़ी की स्थिति में मरीज को नुकसान पहुंच सकता है। इंजेक्शन से किसी तरह की प्रतिक्रिया होने पर जिम्मेदारी तय करना भी मुश्किल हो सकता है।

दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण की तैयारी

ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक के मुताबिक, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। कैंसर की कुछ दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण की प्रक्रिया शुरू की गई है। उम्मीद है कि आगे अन्य दवाओं को लेकर भी कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि एनपीपीए कीमतों पर नजर रख रहा है और ओवरबिलिंग रोकने के लिए भी निर्देश दिए जा रहे हैं।

नियमों में सुधार और निगरानी की जरूरत

निजी अस्पताल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विजय कपूर के अनुसार, दवाओं की डिस्ट्रीब्यूटर कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच बड़ा अंतर गंभीर विषय है। हालांकि, कीमतें सरकारी नियमों और औषधि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत तय होती हैं। उन्होंने कहा कि जरूरत के अनुसार नियमों में सुधार किया जाना चाहिए और यदि मौजूदा नियम पर्याप्त हैं, तो उनका प्रभावी तरीके से पालन सुनिश्चित होना चाहिए।

इस पूरे मामले में कीमतों की पारदर्शिता, बिलिंग की निगरानी और संबंधित पक्षों की जवाबदेही अहम है। मेडिकल सामान और दवाओं के खर्च की स्पष्ट जानकारी मिलने से मरीजों को इलाज के दौरान होने वाले खर्च को समझने और आर्थिक राहत पाने में मदद मिल सकती है।

Digital Desk: Neha Sharma

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