महाकुंभ के सेक्टर 19 में दंडी संन्यासियों का अखाड़ा बना
(UTTARPRADESH, UTTARPRADESH) महाकुंभ के सेक्टर 19 में दंडी संन्यासियों का अखाड़ा बना है। दंडी संन्यासी सबसे बड़ी पहचान इनका दंड है, जो इनके और भगवान के बीच की कड़ी है। इन्हें न तो किसी को छूने का अधिकार है और न ही किसी को छूने देने का। सूत्रों के मुताबिक बताया जा रहा है कि शंकराचार्य बनने से पहले दंडी स्वामी की प्रक्रिया जरूरी है।
यही कारण था कि दंडी संन्यासी के लिये अत्यंत कठोर लक्षण निश्चित किए गए और कठिन तापस जीवन ही उसका मार्ग माना गया, यथा -- निरामिष भोजन, निरपेक्षता, अक्रोध, अध्यात्मरति, आत्मापरकता, गृहत्याग, सिद्धार्थत्व, असहायत्व, अनग्नित्व, परिब्राजकत्व, मुनिभावत्व, मृत्यु से भयहीनता, दु:ख सुख में समान भाव, बस्तियों में केवल भिक्षा के लिये जाना, सांसारिक मामलों से दूर रहना इत्यादि। कालांतर में दंडी संन्यासियों का एक संप्रदाय ही हो गया जो प्राय: भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित "मठाम्नाय महानुशाषनम्" अनुसार पद प्रतिष्ठित अधिकृत शंकराचार्यों द्वारा निर्देशित होने लगा। अद्वैत सिद्धान्त से निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना प्रतिपादित हुयी । भारत के पवित्र माने जानेवाले तीर्थों और नगरों, जैसे द्वारिकापुरी जगन्नाथ पुरी और काशी इत्यादि में आज भी अनेक दंडी आरमों, मुमुक्षु भवनों में अथवा पाठशालाओं और घाटों पर देखे जा सकते हैं।

Author: JAN TV Editorial Team

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