उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली पूजा पाल ने साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियाँ भी किसी के सपनों की उड़ान नहीं रोक सकतीं। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बीच पली-बढ़ी पूजा का घर मिट्टी और छप्पर से बना हुआ है, जहां बरसात में छत से पानी टपकता था। उनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और मां स्कूल में भोजन बनाने का कार्य करती हैं। पांच भाई-बहनों वाले परिवार में पढ़ाई जारी रखना अपने आप में एक चुनौती थी, लेकिन पूजा ने पढ़ाई के साथ-साथ घरेलू काम और पशुओं की देखभाल को भी बखूबी निभाया।
विज्ञान के प्रति उनकी रुचि ने एक नई दिशा तब पकड़ी जब उन्होंने आठवीं कक्षा में एक ऐसा मॉडल तैयार किया जो थ्रेशर मशीन से निकलने वाली धूल को एकत्र करता है। आमतौर पर ये धूल किसानों और आसपास के लोगों के लिए सांस की परेशानी का कारण बनती है, लेकिन पूजा ने टीन और पंखे का इस्तेमाल कर ऐसा सिस्टम तैयार किया जिससे धूल एक थैले में इकट्ठा हो जाती है और वातावरण प्रदूषित नहीं होता। इस मॉडल को तैयार करने में लगभग ₹3000 का खर्च आया, जो उनके परिवार की स्थिति को देखते हुए एक बड़ी राशि थी।
यह इनोवेशन पहले स्थानीय स्तर पर पहचान में आया, फिर जिला और मंडल स्तर की प्रदर्शनियों तक पहुंचा। अंततः यह मॉडल राज्य स्तर पर चुना गया और राष्ट्रीय विज्ञान मेले में भी प्रदर्शित हुआ। पूजा की प्रतिभा को विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सराहा, और वर्ष 2025 में उन्हें जापान में शैक्षिक यात्रा का अवसर दिया गया। यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं था, बल्कि उनकी लगन और सोच का वैश्विक मंच पर सम्मान था।
पूजा पाल की यह यात्रा उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित साधनों में भी कुछ नया कर दिखाने का जज़्बा रखते हैं। यह कहानी बताती है कि छोटे गांवों की बेटियां भी बड़ा सपना देख सकती हैं — और मेहनत से उसे साकार भी कर सकती हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
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