लखपति दीदी बनकर 28 लाख से ज्यादा महिलाओं ने संभाली परिवार की आर्थिक कमान, गांवों में बदल रही तस्वीर
(Lucknow, Lucknow)

लखनऊ, 02 सितंबर। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की आर्थिक भूमिका तेजी से बदल रही है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं अब सिर्फ बचत करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उद्यम, उत्पादन, कारोबार और आय के नए साधनों से जुड़कर परिवार की आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। योगी सरकार के ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत प्रदेश में 10.50 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से करीब सवा करोड़ ग्रामीण परिवार जुड़े हैं। इनमें 28.16 लाख से अधिक महिलाएं ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।

इस बदलाव का असर केवल महिलाओं की व्यक्तिगत आय तक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने के साथ बचत, ऋण, उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ी गतिविधियों का दायरा भी बढ़ रहा है। सरकार का प्रयास स्वयं सहायता समूहों को सिर्फ वित्तीय सहायता प्राप्त करने का माध्यम बनाने के बजाय उन्हें स्थायी आजीविका और उद्यमिता का आधार देने का है।

इसी उद्देश्य से गांवों में समूहों के ऊपर सामुदायिक संस्थाओं का मजबूत ढांचा भी तैयार किया गया है। प्रदेश में 65,544 ग्राम संगठन और 3,298 संकुल स्तरीय संघ कार्य कर रहे हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं को समूह स्तर से आगे बढ़कर प्रशिक्षण, वित्तीय प्रबंधन, आजीविका गतिविधियों और बाजार से जुड़ने के अवसर मिल रहे हैं।


ग्रामीण आजीविका मिशन की कार्यप्रणाली में स्वयं सहायता समूहों की सामूहिक बचत को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। महिलाएं नियमित रूप से छोटी रकम बचाकर आर्थिक अनुशासन विकसित करती हैं। इसके बाद बैंकिंग व्यवस्था, ऋण और अन्य संस्थागत वित्तीय सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान होती है।

मिशन निदेशक अरुण कुमार के मुताबिक, इस व्यवस्था ने उन ग्रामीण महिलाओं के लिए भी आर्थिक गतिविधियों के अवसर तैयार किए हैं, जिनके पास शुरुआत में कारोबार शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी या बाजार तक सीधी पहुंच नहीं थी। महिलाएं खेती से जुड़ी गतिविधियों के अलावा पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, स्थानीय उत्पादों के निर्माण और विभिन्न सेवा गतिविधियों से आय अर्जित कर रही हैं।

इससे महिलाओं की भूमिका परिवार की आय में सहयोग करने वाली सदस्य से आगे बढ़कर आर्थिक निर्णयों में भागीदारी करने वाली सदस्य के रूप में मजबूत हो रही है।


प्रदेश में 28.16 लाख महिलाओं का ‘लखपति दीदी’ के रूप में उभरना ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को दर्शाता है। टिकाऊ आमदनी के जरिए महिलाएं परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों के साथ-साथ भविष्य के लिए बचत और पूंजी तैयार करने की स्थिति में भी आ रही हैं।

महिलाओं की आय में वृद्धि का प्रभाव परिवार के दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ता है। शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों पर खर्च करने की क्षमता बढ़ने के साथ स्थानीय स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं की मांग भी बढ़ती है। इसी वजह से महिला-केंद्रित आजीविका गतिविधियों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है।


उत्तर प्रदेश में 10.50 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों के जरिए करीब सवा करोड़ ग्रामीण परिवारों को जोड़ना मिशन के बड़े विस्तार को दर्शाता है। सामूहिक मंच मिलने से महिलाओं के लिए पूंजी, प्रशिक्षण और बाजार जैसी चुनौतियों से निपटना अपेक्षाकृत आसान हुआ है।

आत्मनिर्भरता की इस प्रक्रिया में महिलाओं को पहले स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जाता है। इसके बाद बचत और वित्तीय प्रबंधन की आदत विकसित करने के साथ उन्हें ऋण, कौशल प्रशिक्षण, उत्पादन और बाजार से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ाया जाता है। इस चरणबद्ध व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आय के स्थायी साधन तैयार करना है।

स्वयं सहायता समूहों को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए ग्राम संगठन और संकुल स्तरीय संघों का नेटवर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ग्राम संगठन स्थानीय स्तर पर विभिन्न समूहों के बीच समन्वय, वित्तीय अनुशासन और आजीविका गतिविधियों को व्यवस्थित करने में मदद करते हैं।

वहीं, संकुल स्तरीय संघों के माध्यम से महिलाओं को बड़े स्तर पर प्रशिक्षण, बाजार और संस्थागत सहयोग से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। मिशन निदेशक अरुण कुमार के अनुसार, इसी सामुदायिक ढांचे के जरिए महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों को विस्तार देने और उन्हें अधिक टिकाऊ बनाने पर जोर है।

ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से सरकार की कोशिश है कि स्वयं सहायता समूहों की ताकत को आय बढ़ाने वाले स्थायी अवसरों में बदला जाए, ताकि महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और परिवारों की आर्थिक स्थिति के साथ गांवों की स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो।

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