इस करार के तहत प्रदेश में स्थापित दीनबंधु मॉडल बायोगैस संयंत्रों को तकनीकी सहायता देने के साथ भविष्य में बनने वाली इकाइयों के लिए भी विशेषज्ञों की व्यवस्था विकसित की जाएगी। योजना के तहत चरणबद्ध तरीके से करीब **1,000 तकनीकी कर्मियों का नेटवर्क** तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। यह नेटवर्क संयंत्रों की स्थापना, संचालन, रखरखाव, तकनीकी प्रशिक्षण और फील्ड स्तर पर निगरानी में सहयोग करेगा।
इस व्यवस्था से बायोगैस संयंत्र स्थापित होने के बाद उनके नियमित संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी। PNP के मुताबिक, संस्था उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अब तक **3,900 से अधिक दीनबंधु बायोगैस इकाइयों** के निर्माण में सहयोग कर चुकी है।
इस पहल का उद्देश्य सिर्फ गोबर से गैस तैयार करना नहीं है। योजना में गोबर के उपयोग को एक व्यापक चक्र के रूप में विकसित करने पर जोर है। बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली जैव-स्लरी का इस्तेमाल जैविक खाद और अन्य बायो-इनपुट तैयार करने में किया जा सकता है, जिसे आगे प्राकृतिक और पुनर्योजी खेती से जोड़ा जाएगा।
इस मॉडल के जरिए गोशालाओं से निकलने वाले गोबर को पहले ऊर्जा के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने और उसके बाद बचे संसाधन को कृषि क्षेत्र में वापस पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करने की कोशिश है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की संभावनाएं बन सकती हैं।
आगे चलकर इस मॉडल को पर्यावरणीय लाभ और कार्बन परियोजनाओं से जोड़ने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।
समझौते का एक प्रमुख हिस्सा ऐसा तकनीकी नेटवर्क तैयार करना है, जो गांव और गोशाला स्तर पर बायोगैस परियोजनाओं को जरूरी सहायता दे सके। प्रशिक्षित कर्मी संयंत्रों की तकनीकी जरूरतों, संचालन और रखरखाव के साथ स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और निगरानी में सहयोग करेंगे।
PNP की भूमिका परियोजना के विभिन्न चरणों में तकनीकी सहयोग देने की होगी। इसमें गोबर और अन्य फीडस्टॉक का आकलन, तकनीकी डिजाइन, संयंत्र निर्माण, संचालन एवं रखरखाव, लाभार्थियों का प्रशिक्षण तथा फील्ड मॉनिटरिंग जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
इस नेटवर्क के विकसित होने से बायोगैस संयंत्रों के संचालन में आने वाली तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, गोबर को सिर्फ अपशिष्ट के तौर पर देखने के बजाय इसे ऊर्जा, जैविक खेती और ग्रामीण आय के स्रोत के रूप में उपयोग करने की आवश्यकता है। उनके मुताबिक, दीनबंधु बायोगैस मॉडल को तकनीकी रूप से मजबूत कर बड़े स्तर पर लागू करने से गोशालाओं, किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए कई तरह के अवसर पैदा हो सकते हैं।
आयोग का जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर है, जिसमें गोवंश संरक्षण के साथ रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा, जैविक कृषि और पर्यावरणीय लाभ भी जुड़े हों। इसके लिए किसानों और ग्रामीण समुदायों की भागीदारी के साथ कार्यक्रम को जमीनी स्तर पर लागू करने की योजना है।
इस मॉडल में गो-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। गोशालाओं से प्राप्त गोबर का इस्तेमाल बायोगैस बनाने में होने के बाद उससे प्राप्त जैव-स्लरी को खाद और कृषि इनपुट के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
इस तरह गोबर से ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन के बाद जैविक संसाधन और फिर कृषि उपयोग का एक चक्र तैयार करने की दिशा में काम किया जाएगा। सरकार की पहल का उद्देश्य गोशालाओं को केवल संरक्षण केंद्रों के बजाय स्थानीय स्तर पर उपयोगी आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है।
यदि यह मॉडल प्रभावी ढंग से लागू होता है तो गोशालाओं के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा, जैविक खेती और आय के नए अवसर विकसित होने की संभावना है।
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