शिव मंदिर से लौटकर ये उपाय होते हैं मंगलकारी
(India) शिव चरित्र हो या शिव भक्ति जगत कल्याण की प्रेरणा और भाव ही मन में पैदा करती है। किंतु अक्सर यह भी देखा जाता है कि इस शिव भाव को भागदौड़ भरे जीवन में कई लोग शिवालय से लौटते ही फिर से सांसारिक क्लेशों में उलझ भूल जाते हैं। इसके पीछे यह भी वजह होती है कि कई भक्त शिवालय में मात्र पाठ-पूजा की चीजों को चढ़ाकर ही शिव भक्ति मान बैठते हैं। जबकि असल शिव भक्ति व उसके शुभ प्रभाव के लिए शिवालय की कुछ खास बातों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। धार्मिक नजरिए से इनको नजरअंदाज करने से शिव भक्ति निरर्थक हो जाती है। दरअसल, शिवालय में शिवलिंग के अलावा शिव परिवार व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा भी स्थापित होती हैं। क्या कभी आप धर्म भाव के साथ यह भी सोचते हैं कि शिव मंदिर में विराजित यह मूर्तियां और इनके दर्शन व्यावहारिक जीवन के लिए कितने शुभ साबित होते हैं? जानिए शिवालय से जुड़े ये दिलचस्प पहलू-
शिव मंदिर में जाते ही सबसे पहले हमें शिव के वाहन नंदी के दर्शन होते हैं। नंदी के बारे में यह भी माना जाता है कि यह पुरुषार्थ का प्रतीक है। यह तर्क ठीक है, किंतु हर विषय और वस्तु का संबंध अंतत: पुरुषार्थ से ही जुड़ता है। शिव मंदिर में नंदी की विशेषता होती है कि उसका मुख शिवलिंग की ओर होता है। आखिर नंदी शिवलिंग की ओर ही मुख करके क्यों बैठा होता है? जानिए शिव वाहन नंदी की इसी मुद्रा का व्यावहारिक जीवन के नजरिए से क्या महत्व है-
नंदी का संदेश है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है, ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की नजर शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी नजर भी आत्मा की ओर हो। इस बात का सरल शब्दों में मतलब है है कि हर व्यक्ति को अपने मानसिक, व्यावहारिक और वाणी के गुण-दोषों की परख करते रहना चाहिए। मन में हमेशा मंगल और कल्याण करने वाले देवता शिव की भांति दूसरों के हित, परोपकार और भलाई का भाव रखना चाहिए। नंदी का इशारा यही होता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही आम भाषा में मन का साफ होना कहते हैं। इससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस तरह संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाता है।
इस तरह अब जब भी मंदिर में जाएं शिव के साथ नंदी की पूजा कर शिव के कल्याण भाव को मन में रखकर वापस आएं। इसे ही शिवतत्व को जीवन में उतारना कहा जाता है।
क्या है शिव मंदिर में कछुए की प्रतिमा का महत्व?
शिव मंदिर में शिवलिंग सहित हर देव मूर्ति या चिन्ह जीवन से जुड़े कुछ न कुछ संकेत जरूर देते हैं। बस जरूरत है इन देव मूर्तियों में छुपे संकेतों को समझने और शिवालय से लौटने पर भी उनको अपना मार्गदर्शक बनाने की, जिससे देव दर्शन सार्थक बन जाए। शिवालय में जाने पर मूर्तियों के क्रम में नंदी के बाद हम कछुए की मूर्ति के दर्शन करते हैं। यह कछुआ शिव की ओर बढ़ रहा होता है, न कि नंदी की ओर। यह कछुआ शिव की ओर ही क्यों सरकता है? जानिए इसमें छिपे संदेशों को-
जिस तरह नंदी हमारे शरीर को परोपकार, संयम और धर्म आचरण के लिए प्रेरित करने वाला माना गया है। ठीक उसी तरह शिव मंदिर में कछुआ मन को संयम, संतुलन और सही दिशा में गति सिखाने वाला माना गया है। कछुए के कवच की तरह हमारे मन को भी हमेशा शुद्ध और पवित्र कार्य करने के लिए ही मजबूत यानि दृढ़ संकल्पित बनाना चाहिए। मन को कर्म से दूर कर मारना नहीं, बल्कि हमेशा अच्छे कार्य करने के लिए जगाना चाहिए। खासतौर पर स्वार्थ से दूर होकर दूसरों की भलाई, दु:ख और पीड़ा को दूर करने के लिए तत्पर रखना चाहिए यानि मन की गति बनाए रखना जरूरी है। सरल शब्दों में मन स्वार्थ और शारीरिक सुखों के विचारों में न डूबा रहे, बल्कि मन को साधने के लिए दूसरों के लिए भावना, संवेदना रखकर कल्याण के भाव रखना भी जरूरी है। यही कारण है कि कछुआ मंगलकारी देव शिव की ओर जाता है, न कि नंदी की ओर, जो शरीर के द्वारा आत्म सुख की ओर जाने का प्रतीक है। आसान शब्दों में अर्थ है नंदी शारीरिक कर्म का और कछुआ मानसिक चिंतन का प्रेरक है।इसलिए अध्यात्म का आनंद पाने के लिए मानसिक चिंतन को सही दिशा देना चाहिए और यह करने के लिए धर्म, अध्यात्म और शिव भक्ति से जुड़ें।

Digital Desk: Shiv Kishor

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