पित्र देवता के लिए छठ पूजा से शुरु करें सूर्य को जल चढ़ाना
(India) सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है यानी सूर्य ऐसे भगवान हैं, जिन्हें हम आसानी से देख सकते हैं, दर्शन कर सकते हैं और प्रत्यक्ष पूजन कर सकते हैं। इसी वजह से छठ पूजा पर सभी पवित्र नदियों पर सूर्य की प्रसन्नता के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं और जल अर्पित करते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य पूजन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार सूर्य को पितर देवता का कारक ग्रह माना गया है। यदि हम हर रोज सूर्य को जल चढ़ाएं तो पित्र देवता की कृपा प्राप्त होती है।
पित्र देवता की प्रसन्नता के बाद मिलती है अन्य देवी-देवताओं की कृपा
ऐसा माना जाता है कि यदि हमारे घर के देवता यानी पित्र देवता प्रसन्न नहीं हैं तो अन्य देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त नहीं की जाती है। पित्र देवता की प्रसन्नता के बिना हमें किसी भी काम में पूरी मेहनत के बाद आसानी से सफलता नहीं मिल पाती है। समाज में सम्मान नहीं मिलता है और बीमारियों का भय भी बना रहता है। पित्र देवताओं को मनाने के लिए श्रेष्ठ उपाय यही है कि हर रोज सूर्य को जल अर्पित किया जाए। सूर्य को जल अर्पित करने का क्रम छठ पूजा से प्रारंभ किया जाएगा तो यह श्रेष्ठ फल प्रदान करता है।
सूर्य को जल चढ़ाने से मिलते हैं ये लाभ
रोज सूर्य को चढ़ाने के लिए श्रेष्ठ समय है ब्रह्म मुहूर्त यानी ठीक सूर्योदय का समय। उगते हुए सूर्य को जल चढ़ाना बहुत लाभदायक माना गया है। इससे पुण्य लाभ तो मिलता है, साथ ही स्वास्थ्य भी श्रेष्ठ रहता है। नेत्र ज्योति बढ़ती है और त्वचा को चमक प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नियमित रूप से सूर्य को जल अर्पित करता है, उसे समाज में पूर्ण मान-सम्मान मिलता है और कार्यों की बाधाएं दूर होती हैं।
ऐसे चढ़ाएं सूर्य को जल
सूर्य को चढ़ाने की सामान्य विधि इस प्रकार है-
रोज सुबह-सुबह उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तांबे के एक लोटे में साफ जल भरें। इसके बाद किसी ऐसे स्थान पर जाएं, जहां से सूर्य दिखाई देता है। उगते हुए सूर्य को जल चढ़ाएं। जल चढ़ाते समय सूर्य मंत्र का जप किया जा सकता है। सूर्य मंत्र- ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ खगाय नम: आदि।
सृष्टि का कर्ता-धर्ता है सूर्य
सूर्य देव को इस संपूर्ण सृष्टि की आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही जीवन है, यह एक सर्वमान्य सत्य है। प्राचीन समय में विद्वान सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता-धर्ता मानते थे। ऋग्वेद के अनुसार समस्त देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद में कहा गया है कि चक्षो सूर्यो जायत यानी सूर्य देव परमात्मा के नेत्र हैं।
ब्रह्मवैर्वत पुराण में सूर्य को ही परमात्मा स्वरूप माना गया है। गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। इन्हीं कारणों से वैदिक काल से ही सूर्य की आराधना की जाती रही है। शास्त्रों के साथ ही सूर्य का महत्व आयुर्वेद में भी बताया गया है। यदि हम नियमित रूप से सुबह-सुबह सूर्योदय के समय कुछ देर सूर्य के सामने रहें तो इससे त्वचा की चमक बढ़ती है

Digital Desk: Shiv Kishor

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