हालांकि शीर्ष अदालत ने जानना चाहा कि संसद ने पतियों द्वारा जबरन यौन संबंध से 15 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की वैवाहिक लड़कियों के संरक्षण के पहलू पर चर्चा की या नहीं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि अदालत उन वैवाहिक लड़कियों के अधिकार की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती है या नहीं जिनका उनके पतियों द्वारा यौन शोषण हुआ हो। जस्टिस एम बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि संसद ने वैवाहिक बलात्कार के मुद्दे पर विस्तृत बहस की है और माना गया कि यह बलात्कार के अपराध में नहीं आता है। इसलिए इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि 15 साल से कम की आयु की लड़की का विवाह अवैध है। पीठ ने कहा कि ऐसे भी मामले हैं जब कॉलेज जाने वाले 18 साल से कम आयु के किशोर किशोरियां रजामंदी से यौन संबंध बना लेते हैं और कानून के तहत उन पर मामला दर्ज हो जाता है। इससे किसको परेशानी होने वाली है्र लड़के की गलती नहीं है। सात साल की सजा बहुत कठोर है।
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