तीनों जजों ने कहा कि 1937 के मुस्लिम शरीयत कानून के तहत तलाक को धारा 2 में मान्यता दी गई है और उसकी विधि बताई गई है। चूंकि यह कानून के रूप में था इसलिए यह संवैधानिक सिद्धांतों की जांच के दायरे में आएगा। संविधान के सिद्धांतों को देखते हुए तीन तलाक स्पष्ट रूप से मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ है। इसलिए इसे सिरे से रद्द किया जाता है। समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार शीर्ष अदालत ने 3-2 के मत से सुनाए गए फैसले में इस तीन तलाक को कुरान के मूल तत्व के खिलाफ बताया।
जस्टिस कुरियन ने कहा कि वह तीन तलाक को धर्म का हिस्सा मानने के सीजेआई के मत से सहमत नहीं हैं। यह धर्म का अभिन्न अंग नहीं है। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का तीन तलाक को गैरकानूनी मानने वाला शमीमआरा फैसला सही कानून घोषित करता है और वह उसे बरकरार रखते हैं। जो धर्म में गलत है वह कानून में सही नहीं हो सकता।
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