independence day 2018- देश के अमर सपूतों की शहादत को याद दिलाते हैं ये 5 टूरिस्ट प्लेस
(DELHI, DELHI) देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले महापुरुषों में चंद्रशेखर आजाद का नाम पहले नंबर पर आता है। चंद्रशेखर आजाद को यदि आप उनकी देशभक्ति के लिए श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो आपको इलाबाद के अल्फ्रेड पार्क एक बार जरूर जाना चाहिए। इस पार्क को अब शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से भी जाना जाता है। यह वही स्थान है जब कायर अंग्रेजों ने उन्हें एक पेड़ के नीचे घेर लिया था। आजाद अकेले दम पर यहां अंग्रेजों से भिड़ गए थे और अपनी पिस्टल की आखिरी गोली खुद को मार ली थी। वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज उनके जीवित शरीर को हाथ लगा पाएं। शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क की यही भूमि आजाद के लहू से भीगी थी। जब आप यहां जाएंगे तो इलाहाबाद संग्रहालय में रखी आजाद की वो पिस्टल देखना न भूलें जो कभी आजाद के साथ हमेशा रहती थी।
रांनी लक्ष्मीबाई के प्रकांड सौर्य और बलिदान का साक्षी झांसी का किला है। इसी किले के नाम से मशहूर शहर झांसी आज उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जून 1859 में अंग्रेजी फौज ने जब किले को चारोओर से घेर लिया तो रानी और उनके वीर सिपाहियों ने करीब 10 दिन तक अंग्रेजों की फौस से लोहा लिया। रानी ने प्रतिज्ञा लिया था कि जब तक उनमें जान रहेगी तब तक वह अपने किले की रक्षा करेंगी। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेजों ने आठ दिन तक इस किले पर तोपों से गोले बरसाए लेकिन किले की एक भी दीवार तोड़ नहीं सके थे। युद्ध करते-करते 18 जून 1959 को बुरी तरह से घायल रानी अमर हो गईं। आज देश विदेश से हजारों लोग इस किले को देखने आते हैं। देशभक्त लोगों के लिए यह किला रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान की निशानी है।
13 अप्रैल 2018 को जलियांवाला बाग नरसंहार अपने 99 साल पूरे कर चुका है। यह स्थान देश के लिए बलिदान होने वाले हजारों निहत्थे लोगों की शहदात अंग्रेजों की क्रूरता के लिए जाना जाता है। जलियांवाला बाग पंजाब में अमृतसर जिले में स्वर्ण मंदिर के पास है। 13 अप्रैल 1919 में अंग्रेज ब्रिगेडियर जनरल डायर ने इस बगीचे में इकट्ठे हुए सैकड़ों लोगों पर गोलियां चलवा दी थीं। अमृतसर जाने वाला प्रत्येक नागरिक जलियांवाला बाग जरूर जाता है।
माना जाता है कि मंगल पांडे पहले स्वतंत्रत सेनानी है जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। वे बैरकपुर छावनी में बंगाल नेटिव इंफैंट्री की 34वीं रेजीमेंट में सिपाही थे। मंगल पांडे के विद्रोह के एक महीने बाद ही 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में भी बगावत हो गई और यह विद्रोह देखते-देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया। हालांकि अंग्रेज इस विद्रोह को दबाने में सफल हो गए, लेकिन मंगल पांडे के संघर्ष और विद्रोह को आज भी याद किया जाता है।
उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले का एक कस्बा है चौरी चौरा। यहां 4 फरवरी 1922 को जो घटना घटी थी उसने महत्मागांधी को भी परेशान कर दिया था। अंग्रेजों दमनकारी शक्ति ने शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे आंदोलन कारियों पर गोलियां चला दी। इससे आंदोलनकारी आक्रोशित हो उठे और चौरी चौरा थाने में मौजूद 23 पुलिस कर्मचारियों को जलाकर मार डाला था। इस घटना में 11 आंदोलनकारी भी शहीद हुए थे।

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