सिंधु जल समझौता,अगले हफ्ते इस्लामाबाद में चर्चा करेंगे भारत-पाकिस्तान के अधिकारी
(India) सिंधु जल समझौते पर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद है। दोनों देश इस मसले को सुलझाने के लिए तमाम प्रयास करते रहे हैं। पाकिस्तान में इमरान खान की नई सरकार आने के बाद एकबार फिर दोनों देश इस मसले पर चर्चा करने वाले हैं। हालांकि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के कड़े रुख को देखते हुए इस बैठक के परिणाम पर आशंकाएं भी हैं। भारत इस मुलाकात को 'सिंधु जल समझौते' के तहत जरूरी बता रहा है वहीं, पाकिस्तान किशनगंगा प्रॉजेक्ट पर भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है।
1947 में आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के मसले पर जोरदार खींचतान चली और नहरों के पानी पर खूब विवाद हुआ। विभाजन के बाद नहरों के पानी को लेकर पाकिस्तान सशंकित हो गया था। 1949 में एक अमेरिकी एक्सपर्ट डेविड लिलियेन्थल ने इस समस्या को राजनीतिक की जगह तकनीकी तथा व्यापारिक स्तर पर सुलझाने की सलाह दी। लिलियेन्थल ने दोनों देशों को राय दी कि वे इस मामले में विश्व बैंक से मदद भी ले सकते हैं। सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार भी कर लिया। सालों चली बातचीत के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल पर समझौता हुआ। इसे ही 1960 की सिन्धु जल संधि कहते हैं।
इस संधि पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने रावलिपिंडी में दस्तखत किए थे। 12 जनवरी 1961 से संधि की शर्तें लागू कर दी गईं थी। संधि के तहत 6 नदियों के पानी का बंटवारा तय हुआ, जो भारत से पाकिस्तान जाती हैं। 3 पूर्वी नदियों (रावी, व्यास और सतलज) के पानी पर भारत का पूरा हक दिया गया। बाकी 3 पश्चिमी नदियों (झेलम, चिनाब, सिंधु) के पानी के बहाव को बिना बाधा पाकिस्तान को देना था। संधि में तय मानकों के मुताबिक भारत में पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इनका करीब 20 फीसदी हिस्सा भारत के लिए है।

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