68 दिन लॉकडाउन में गुजारे तो पता चला जिंदगी की कीमत क्या होती है। ये भी समझ आया कि वो हम ही हैं जो खुद को साफ-पाक बताकर बाकी सबको गंदा करने का जुर्म कर रहे हैं। अलसाई सुबह की चाय से लेकर देर रात के खाने तक हमने यू हीं बातों-बातों में एक बार तो इस तोहमत को कुबूल करके आंखें भी झुका ली।
बहरहाल, चार खंडों में - 68 दिन का कोराना- उपवास खत्म हुआ। अब फिर वही हाल और हालात बन रहे हैं, फिर वही धूल, धुआं, गंदगी और जहर फैलना तय है। कुदरत ने तो इन दिनों में दिखा दिया कि, हम इंसानों के बिना भी वो बहुत खुश है।
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