चार महीने तक कठोर अनुशासन में रहकर उन्होंने खुद को तैयार किया—हर सुबह घंटों पैदल चलना, शाम को 5–6 किलोमीटर वॉक। बिना किसी बड़ी टीम या शोर-शराबे के, सिर्फ एक पोर्टर और अटूट विश्वास के साथ वे निकलीं। बर्फ़ीले रास्ते, ऑक्सीजन की कमी और कठिन ट्रेल्स के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। इस पूरी यात्रा का खर्च उन्होंने अपनी सिलाई की कमाई से उठाया और जाते वक्त अपने गहने बेटों को सौंप दिए—यह डर नहीं, जिम्मेदारी थी।
23 फरवरी 2024 को वसंती चेरुवीत्तिल कसावु साड़ी पहनकर, हाथ में तिरंगा लिए एवरेस्ट बेस कैंप (5,364 मीटर) पर खड़ी थीं। यह सिर्फ एक चढ़ाई नहीं, बल्कि एक संदेश था—औरत की उम्र नहीं होती, उसके इरादे होते हैं। अब उनका अगला लक्ष्य है ग्रेट वॉल ऑफ चाइना।
Author: JAN TV Editorial Team
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