राजस्थानी थीम पर आधारित इस घोष शिविर को घोष गांव के रूप में सजाया गया है। इसमें व्यवस्थाओं के स्थल को ठिकाणा गोविंद देव नाम दिया गया है। घोष वादक स्वयंसेवकों के आवासों को संबंधित जिले के वाद्ययंत्रों का नाम दिया गया है। इसमें शेखावाटी क्षेत्र के सीकर, झुंझुनू व चुर जिले से आने वाले वादक स्वयंसेवकों के आवास परिसर को ढाणी चंग, जयपुर के स्वयंसवकों के आवास को मोरचंग ढाणी और भरतपुर, अलवर के स्वयंसेवकों के आवास को ढाणी इकतारा नाम दिया गया है। इसी प्रकार अन्य आवासों के नाम अलगोजा, खरताल आदि दिए गए हैं। संघ में घोष वादन आरंभ से ही होता रहा है। पहले इसमें सेना के बैंड की धुनें ही बजाई जाती थीं, लेकिन अब संघ ने खुद की कई रचनाएं भी तैयार की हैं। संघ में वाद्य यंत्रों के नाम भी रखे गए हैं। जैसे बांसुरी को संघ में वंशी कहा जाता है, इसी तरह बिगुल को शंख, बास ड्रम को पणव कहा जाता है और साइड ड्रम को अणक, ट्रम्पेट को तूर्य, सेक्सोफोन को नागांग और क्लेरिनेट को स्वरद कहा जाता है।
Author: JAN TV Editorial Team
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