यही तस्वीर टेलीकॉम, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं में भी दिखती है। मोबाइल रिचार्ज में जियो और एयरटेल, ऑनलाइन शॉपिंग में अमेजन और फ्लिपकार्ट, मैसेजिंग में व्हाट्सएप और टेलीग्राम—हर जगह उपभोक्ता दो विकल्पों तक सीमित है। नतीजा यह है कि कीमतें बढ़ती हैं, सस्ते प्लान गायब हो जाते हैं और शिकायतों के बावजूद कंपनियों पर खास दबाव नहीं बनता। प्रतिस्पर्धा नाम मात्र की रह जाती है।
कैब सर्विस में ओला-उबर, फूड डिलीवरी में जोमैटो-स्विगी और क्विक कॉमर्स में ब्लिंकिट-जेप्टो जैसी जोड़ियों ने रोजमर्रा की जरूरतों को आसान तो बनाया है, लेकिन सस्ता नहीं। अतिरिक्त शुल्क, डार्क पैटर्न और मनमाने चार्ज आम हो गए हैं। साफ है कि भारत में अब खतरा सिर्फ एक कंपनी के वर्चस्व का नहीं, बल्कि दो बड़ी कंपनियों की साझा पकड़ का है, जो उपभोक्ताओं के सामने विकल्प ही नहीं छोड़ती।
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