- साफ और समतल जमीन पर आसन बिछाकर बैठें, हिले-डुले नहीं।
- सांस को इस तरह काबू करें कि श्वास लेते वक्त पेट फूले और सांस छोड़ते समय पेट पीठ से चिपक जाए।
- इस तरीके से सांस पहले धीरे-धीरे लें, फिर उसमें थोड़ी तेजी लाएं। थकान या कमजोरी लगे तो विश्राम का भी ध्यान रखें।
- सांसों को बाहर निकाल किसी रूप या बिंदु पर ध्यान टिकाएं।
- अब सांस लेते वक्त सांसों को आता-जाता देखने पर ध्यान दें।
- गुरु मंत्र का जप करें। पहले होंठ से, फिर जीभ, कण्ठ, हृदय और नाभि से। मंत्र को सांसों के साथ जोड़ें।
- मंत्र की ध्वनि जितनी लय में होगी, सिद्धि उतनी जल्द मिलेगी। मन इधर-उधर जाएं तो उसे जाने दें। वह जहां जाए उसे देखतेभर रहें।
- मन के साक्षी ईश्वर के साथ जो खुद को करने वाला कहता है यानी मैं को महसूस करें।
- जब सोच या भाव की स्थिति में हों, तो भी यह जानने की कोशिश करें कि कौन इन सबसे प्रभावित हो रहा है।
- इनके अलावा ध्यान के साथ किए जाने वाले पूजा और कर्मकांडों को करते समय उसके बाहरी तौर-तरीकों में ही न उलझें रहे, उनकी आत्मा को, जिसे तत्व कहा जाता है, जानने की कोशिश करें।
इस तरह आप जितना खुद को संतुलित और ध्यानी या भीतर की ओर गौर करने वाला बनाने की कोशिश करेंगे, उतने ही शांत और सहज होते जाएंगे। आध्यात्मिक नजरिए से रग-रग में मौजूद भगवान आपकी भावना की सच्चाई को जानने व समझने के बाद आपको खुद राह बताएंगे यानी सिद्ध बना देंगे।
Digital Desk: Shiv Kishor
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