माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।
माघ मास में प्रयाग में स्नान, दान, भगवान विष्णु के पूजन व हरिकीर्तन के महत्व का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है-
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरतपतिहिं आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।
पद्मपुराण के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहत्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है-
व्रतैर्दानैस्तपोभिश्च न तथा प्रीयते हरि:।
माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशव:।।
प्रीतये वासुदेवस्य सर्वपापापनुक्तये।
माघस्नानं प्रकुर्वीत स्वर्ग लाभाय मानव:।।
अर्थात व्रत, दान और तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में स्नान मात्र से होती है। इसलिए स्वर्ग लाभ, सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान अवश्य करना चाहिए।
धर्म शास्त्रों में भी लिखा है इस महीने का महत्व
धर्म शास्त्रों में माघ मास को बहुत ही पवित्र माना गया है। मत्स्य पुराण, महाभारत आदि धर्म ग्रंथों में माघ मास का महत्व विस्तार से बताया गया है। इस मास में भगवान माधव की पूजा करने तथा नदी में स्नान करने से मनुष्य स्वर्गलोक में स्थान पाता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार -
स्वर्गलोके चिरं वासो येषां मनसि वर्तते।
यत्र क्वापि जले तैस्तु स्नातव्यं मृगभास्करे।।
अर्थात जिन मनुष्यों को चिरकाल तक स्वर्गलोक में रहने की इच्छा हो, उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर पवित्र नदी में प्रात:काल स्नान करना चाहिए।
माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन य: क्षिपेत्।
श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते।।
अर्थात जो माघ मास में नियमपूर्वक एक समय भोजन करता है, वह धनवान कुल में जन्म लेकर अपने कुटुम्बजनों में महत्व को प्राप्त होता है।
अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम्।
राजसूयमवाप्रोति कुलं चैव समुद्धरेत्।।
अर्थात माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह अपने कुल का उद्धार कर देता है।ऐसे करें भगवान का पूजन, हर सुख मिलेगा
हिंदू धर्म में माघ मास स्नान, तप व उपवास के लिए श्रेष्ठ माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस मास में यदि विधिपूर्वक भगवान माधव की पूजा की जाए तो सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। माघ मास में विधिपूर्वक भगवान माधव की पूजा से पहले सुबह तिल, जल, फूल, कुश लेकर इस प्रकार संकल्प करना चाहिए-
ऊँ तत्सत् अद्य माघे मासि अमुकपक्षे अमुक-तिथिमारभ्य मकरस्त रविं यावत् अमुकगोत्र अमुकशर्मा (वर्मा/गोप्तोहं) वैकुण्ठनिवासपूर्वक श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं प्रात: स्नानं करिष्ये।
इसके बाद ये प्रार्थना करें-
दु:खदारिद्रयनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणाय: च।
प्रात:स्नानं करोम्यद्य माघे पापविनाशनम्।
मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव।
स्नानेनानेन मे देव यथोक्तपलदो भव।।
दिवाकर जगन्नाथ प्रभाकर नमोस्तु ते।
परिपूर्णं कुरुष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम्।
माघमासमिमं पुण्यं स्नानम्यहं देव माधव।
तीर्थस्यास्य जले नित्यं प्रसीद भगवन् हरे।।
माघ मास की ऐसी महिमा है कि इसमें जहां कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है, फिर भी प्रयाग, काशी, नेमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है। धर्मग्रंथों के अनुसार यदि इस प्रकार पूरे मास भगवान माधव का पूजन किया जाए तो वे अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।
जानिए माघ स्नान और सुव्रत के कल्याण की रोचक कथा
माघ मास के माहात्मय को व्यक्त करती कई लोककथाएं प्रचलित हैं। पद्मपुराण में भी माघ मास में महत्व का वर्णन है। उसी के अंतर्गत एक कथा ये भी है-
प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर सुव्रत नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे समस्त वेद-वेदांगों, धर्मशास्त्रों व पुराणों के ज्ञाता थे। वे अनेक देशों की भाषाएं व लिपियां भी जानते थे। इतना विद्वान होते हुए भी उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग धर्म के कार्यों में नहीं किया। पूरा जीवन केवल धन कमाने में भी गवां दिया। जब सुव्रत बूढ़े हो गए तब उन्हें स्मरण हुआ कि मैंने धन तो बहुत कमाया, लेकिन परलोक सुधारने के लिए कोई कार्य नहीं किया।
यह सोचकर वे पश्चाताप करने लगे। उसी रात चोरों ने उनके धन को चुरा लिया, लेकिन सुव्रत को इसका कोई दु:ख नहीं हुआ क्योंकि वे तो परमात्मा को प्राप्त करने के लिए उपाय सोच रहे थे। तभी सुव्रत को एक श्लोक याद आया
माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।
सुव्रत को अपने उद्धार का मूल मंत्र मिल गया। सुव्रत ने माघ स्नान का संकल्प लिया और नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा के जल में स्नान किया। दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। सुव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा कार्य नहीं किया था, लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो चुका था। जब उन्होंने अपने प्राण त्यागे तो उन्हें लेने दिव्य विमान आया और उस पर बैठकर वे स्वर्गलोक चले गए।
Digital Desk: Shiv Kishor
DISCLAIMER:
इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।