कभी-कभी 20 से 25% तक पहुंच जाता है संक्रमण
सर्दियों के दौरान सांस की तकलीफ, सीने में जकड़न, नाक बंद, जुकाम, छींक, खांसी, सिरदर्द, गले में खराश जैसी समस्याएं फ्लू के वायरस से बढ़ जाती हैं। इसके अलावा ठंड लगने के साथ 100 से 104 डिग्री तक बुखार भी फ्लू के लक्षणों की पहचान है। हर साल अमूमन 10 फीसदी आबादी इस वायरस की चपेट में आ जाती है। यदि किसी साल इसका संक्रमण बढ़ जाता है तो 25 से 30 फीसदी तक लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।
बच्चों में कमजोर प्रतिरोधक क्षमता और सफाई का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं।
फ्लू के वायरस छींकने या खांसने के बाद निकलने वाली छोटी-छोटी बूंदों से फैलते हैं। इन बूंदों का आकार लगभग 1.5 माइक्रोमीटर होता है और ये सांस के जरिये नाक और फेफड़े तक पहंुचते हुए स्वस्थ लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। जहां सघन आबादी होती है, वहां यह वायरस तेजी से फैलता है।
सर्दियों के दौरान फ्लू के वायरस इतने सक्रिय होते हैं कि कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों को दरवाजे के हैंडल, करेंसी नोट छूने, हाथ मिलाने या सार्वजनिक चीजों के संपर्क में आने से भी ये अपनी चपेट में ले लेते हैं और उन्हें एक सप्ताह से लेकर 17 दिनों तक परेशान कर सकते हैं।
सर्दी के दौरान तापमान कम हो जाता है और घर के दरवाजे-खिड़कियां बंद रहते हैं, जहां इस वायरस को पनपने का माहौल मिल जाता है। यदि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत नहीं है तो विंटर फ्लू के वायरस कुछ समय के लिए परेशान कर सकते हैं।
फ्लू से संक्रमित व्यक्ति से दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों में इसका वायरस तेजी से फैलता है। इससे बचाव का एक सरल तरीका यह भी है कि जब वह व्यक्ति खांसे, छींके या बात करे तो आप उससे छह फुट की दूरी बनाए रखें।
बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जहां वायरस तेजी से पनपता है और फ्लू की समस्या को खतरनाक स्तर पर पहुंचा देता है।
हृदय रोग से पीड़ित बुजुर्गों में तो इस वायरस से उभरने के बाद हार्ट अटैक तक का खतरा रहता है। दरअसल, बुजुर्गों को फ्लू के कारण अत्यधिक संक्रमण की शिकायत हो जाती है, जो वायरस से मुकाबले के कारण होता है। इस वजह से उनके शरीर में कई पोषक तत्वों की कमी भी हो जाती है। यही कारण है कि हर साल फ्लू के ठीक बाद संक्रमण से उभरने वाले हार्ट अटैक और स्ट्रोक के कारण भी मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है
मोटापे जैसी गंभीर स्थितियां भी संक्रमण को बढ़ाती हैं और ये फ्लू के असर को अधिक खतरनाक बना देती हैं।
फ्लू के कारण उत्पन्न निमोनिया को महिलाओं में चौथा और पुरुषों में छठा सबसे बड़ा जानलेवा रोग माना गया है।
विंटर फ्लू की महामारी किसी खास क्षेत्र में दो से तीन सप्ताह तक सक्रिय होते हुए पांच से छह सप्ताह तक बनी रहती है। इसके बाद यह जिस तेजी से आती है, उसी तेजी से गायब भी हो जाती है।
नर्सिंग होम में इस बीमारी का फैलना आम बात है। इस कारण फ्लू के कारण कई लोग गंभीर लक्षणों तथा मौत तक की चपेट में आ जाते हैं।
(धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. गौरव जैन से की गई बातचीत पर आधारित)
फ्लू से बचाव के लिए टीका अब तक सबसे कारगर माना गया है। हालांकि यह आपको फ्लू से 50-60 फीसदी तक ही बचा सकता है, लेकिन जब आप इसकी चपेट में आते हैं तो टीकाकरण के कारण आप इसके गंभीर लक्षणों की चपेट में आने से बच जाते हैं।
नाक से स्प्रे लेने वाले टीके का इस्तेमाल भी कारगर साबित होता है।
गर्भवती महिलाओं, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों और डायबिटीज, दिल या किडनी की बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों को टीके का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
भारत में इनहेल्ड फ्लू वैक्सीन अभी उपलब्ध भी नहीं है और हम ट्राइवेलेंट और क्वाड्रावेलेंट इंट्रा मस्कुलर इंजेक्शन पर ही निर्भर हैं। छह माह से आठ साल के बच्चों को फ्लू से सुरक्षा के लिए टीके की दो खुराक दी जाती हैं।
कई एंटीवायरल दवाएं भी हैं, जो एंटीबायोटिक्स से अलग होती हैं और इस वायरस के लक्षणों की गंभीरता और अवधि को कम कर सकती हैं। फ्लू की चपेट में आने से दो दिन के अंदर इनका सेवन करने से ये ज्यादा कारगर होती हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
DISCLAIMER: इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।