यहां किसी भी पारिवारिक विवाद, जमीन के झगड़े, शादी से जुड़े मामलों या आपसी कहासुनी में सबसे पहले पंच बैठता है। पंच दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और फिर सामूहिक सहमति से फैसला लिया जाता है, जिसे पूरा गांव मानता है। ग्रामीणों का मानना है कि इससे समय और पैसे दोनों की बचत होती है, साथ ही रिश्ते भी टूटने से बच जाते हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव में बैठकर बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की परंपरा नई पीढ़ी को भी सामाजिक समरसता और शांति का संदेश देती है। कई मामलों में समझौते की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है, लेकिन कोशिश यही रहती है कि रिश्तों को बचाया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतों में मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के बीच यह पारंपरिक व्यवस्था एक वैकल्पिक सामाजिक मॉडल के रूप में सामने आती है। इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा आजादी से पहले की है और आज भी धरमपुर तथा कपराड़ा के गांवों में पूरी मजबूती के साथ कायम है।
बदलते समय के बावजूद गुजरात के ये गांव यह साबित कर रहे हैं कि आपसी संवाद, विश्वास और सामाजिक भागीदारी से भी न्याय का रास्ता निकाला जा सकता है।
Author: JAN TV Editorial Team
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