गंगा की मुख्य धारा में जहां कभी लगातार बहता जल दिखाई देता था, वहां अब कई स्थानों पर रेत की परतें नजर आ रही हैं। नदी के किनारों पर भी फैली रेत इस बात का संकेत दे रही है कि गर्मी और जल संकट का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मौसमी बदलाव का परिणाम नहीं है, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी भी हो सकती है। जानकारों के अनुसार गंगा के जलस्तर में गिरावट के पीछे पनबिजली परियोजनाएं, सिंचाई के लिए बनाई गई लिफ्ट नहरें और पानी के बढ़ते दोहन जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि गर्मियों के दौरान तेज धूप की वजह से नदी के पानी का तापमान भी बढ़ जाता है। इससे जलीय जीव-जंतुओं और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही नदी की प्राकृतिक रूप से प्रदूषकों को कम करने की क्षमता भी कमजोर होने लगती है, जिससे जल गुणवत्ता प्रभावित होती है।
गंगा करोड़ों लोगों की आस्था, आजीविका और जीवन का आधार है। ऐसे में पर्यावरणविद दीर्घकालिक समाधान अपनाने पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, भूजल स्तर में सुधार करना और नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के केंद्र वाराणसी में गंगा का घटता जलस्तर अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक चिंता का विषय भी बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
Author: JAN TV Editorial Team
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