प्रशिक्षण के दौरान पुलिस अधिकारियों को क्राइम सीन के वैज्ञानिक प्रबंधन, साक्ष्य संरक्षण, साइबर फॉरेंसिक, डिजिटल एविडेंस और आधुनिक विवेचना तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इसका उद्देश्य पुलिस जांच को वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित बनाना है, जिससे अदालत में मजबूत पैरवी हो सके और दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया प्रभावी बने।
समापन समारोह में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. प्रशांत कुमार ने कहा कि फॉरेंसिक विज्ञान का मूल उद्देश्य जांच को सशक्त बनाकर न्याय प्रणाली को मजबूत करना है।
उन्होंने कहा कि DNA, फिंगरप्रिंट और अन्य भौतिक साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण अपराधियों की पहचान और सफल विवेचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लिए अपराध स्थल से साक्ष्यों का उच्च गुणवत्ता के साथ संकलन और संरक्षण जरूरी है।
डॉ. प्रशांत कुमार ने प्रशिक्षित अधिकारियों से अपने-अपने जिलों में ट्रेनर ऑफ ट्रेनर्स (TOT) की भूमिका निभाते हुए अन्य पुलिसकर्मियों को भी प्रशिक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने विश्वस्तरीय फॉरेंसिक शिक्षा और विशेषज्ञ तैयार करने के उद्देश्य से इस संस्थान की स्थापना की है।
UPSIFS के संस्थापक निदेशक डॉ. जी.के. गोस्वामी ने कहा कि कानून और विज्ञान का संगम ही फॉरेंसिक विज्ञान है और न्याय की पहली सीढ़ी पुलिस तैयार करती है।
उप निदेशक जितेन्द्र श्रीवास्तव ने बताया कि छह सप्ताह के प्रशिक्षण में अधिकारियों को क्राइम सीन मैनेजमेंट के अलावा साइबर फॉरेंसिक, डिजिटल साक्ष्य संरक्षण और आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी गई। इसका इस्तेमाल अधिकारी अपने जिलों में वैज्ञानिक विवेचना को और प्रभावी बनाने के लिए कर सकेंगे।
कार्यक्रम में उप महानिरीक्षक हेमराज मीना समेत संस्थान के कई वरिष्ठ अधिकारी, विशेषज्ञ और प्रशिक्षक मौजूद रहे।
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