रिजर्व बैंक ने फाइनैंशल रेग्युलेशन में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। उसने कहा है कि बैंकों को बचाव के उपाय करने के बाद रिस्क लेने में पीछे नहीं रहना चाहिए। रिजर्व बैंक ने रिस्क की पहचान करने और उनसे निपटने की एक्सपर्टाइज डिवेलप करने का भी सुझाव दिया है। फाइनैंशल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में आरबीआई ने लिखा है, बैंकों और दूसरी फाइनैंशल इंटरमीडियरीज से यह नहीं कहते कि वे रिस्क न लें। हालांकि, उन्हें पहले उसके असर से बैलेंस शीट को बचाने के इंतजाम करने चाहिए। रिजर्व बैंक चाहता है कि बैंक रिस्क की पहचान करने में प्रो-एक्टिव रोल अदा करें और उन्हें ठीक से मैनेज करें। बैंकिंग रेग्युलेटर का मानना है कि फाइनैंशल मार्केट में रिस्क तो लेना ही पड़ता है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शॉर्ट टर्म ग्रोथ टारगेट हासिल करने के लिए फंडामेंटल डिसिप्लिन और मुकम्मल जांच के बाद लोन देने की कुर्बानी नहीं देनी चाहिए। रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने कहा है, अगर फाइनैंशल सिस्टम मजबूत और भरोसेमंद होता है तो इससे लॉन्ग टर्म में टिकाऊ ग्रोथ हासिल होगी। जो लोग रूल्स का पालन करना चाहते हैं, आरबीआई उनके लिए कंप्लायंस की कॉस्ट कम कर सकता है। वहीं, वह रेग्युलेशन से भागने वालों के लिए इसे मुश्किल और महंगा बनाएगा।
Digital Desk: Kamal
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